एक शानदार आईना
एक शानदार आईना
भगवान किसके साथ जुड़ेंगे, यह कहना संभव नहीं है। मेराही उदाहरण ले लो! मैं लोकप्रिय फिल्मस्टार अरुंधति हूँ। कौशल अभिनय, सुंदर रूप; लेकिन भगवानने किसके साथ मेरी गाँठ बाँधी..? एक बदसूरत, लंगड़ी बहन के साथ! लेकिन मैं शिकायत नहीं कर रही हूँ। भगवान के मन में जैसा होता है वैसा ही होता है, ऐसा कहती हूँ और इस बदसूरत, लंगड़ी बहन की देखभाल करती रहती हूँ। हाँ... उसका दूसरा हैही कौन..? अपनी बहन के अलावा वो किसका चेहरा देखेगी।
पिताजी चल बसे और हम अनाथ हो गए, तब मैं सिर्फ बीस साल की थी। अवंतिका केवल सत्रह साल की थीं। बचपन में उसके पैर सूज गए थे। उसकी काया एक जैसी थी और रंग साँवला था।
लेकिन उसके विपरीत मैं रूप, शरीर और चरित्र में बहुत सही थी। हम दोनों को एक साथ देखकर लोग 'अमावस-पूनम' कहते थे। पापा भी खुल्लम-खुल्ला ऐसे ही बोलते थे। हालाँकि अवंतिका को इस बात का कुछ भी मलाल नहीं था। किसी ने उसे सिर्फ कुछ कहा या उसकी कमजोरी का जिक्र किया, तो वह बस हँसकर उस बात को नजरअंदाज कर देती थी। हँसते समय उसके गालपर डिंपल आता था, सिर्फ़ उसी वक़्त वो खूबसूरत लगती थी। उसके मन को कभी बुरा लगा हो ऐसा उसने कभी दिखाया या फ़िर जताया नहीं। निश्चय ही पाखंडी! उसको बुरा लगता था? लेकिन ये बात छुपाने की क्यों? और हरबार बात को हँसकर टालने का नाटक क्यों?
मेरा स्वभाव उसके बिल्कुल विपरीत था। मैं अपने मन की बात कह देती हूँ। मुझे कोई बुरा कहे सवाल ही नहीं उठता। रंगरूप तो था ही, मेरे गुण भी सराहनीय थे। मैं अपनी बढ़ाई नहीं कर रही, लेकिन जब से मैं स्कूल में थी, सभी मेरे गाने और नाटक में काम करने की तारीफ करते थे। कुछ परिस्थिति के कारण, मैं गाना जारी नहीं रख पायी; लेकिन मेरे अंदर की अदाकारी ने मुझे बहुत मदत की। मेरी एक दोस्त ने अपनी शिक्षा अधूरी छोड़कर सिनेमा में चली गयी थी। पापा के चले जाने के बाद, जब खाने की किल्लत पड़ने लगी, तब वो दोस्त मुझे अपने साथ ले गयी। मेरे रूप-रंग और काम के बारे में मेरी समझ दोनों को देखकर, मुझे धीरे-धीरे, छोटे-बड़े ही क्यों ना, लेकिन याद रखने जैसे काम मिलते गए। मैंने भी किसी भी काम के लिए ना-नुकुर नहीं की। सिनेमा में जो काम मिलता गया वो मैं करती गयी और उसमें पकड़ बनायीं। पिछले दस वर्षों में, मैंने बहुत पैसा कमाया, और अब मेरी एक अलग पहचान है।
मैंने अवंतिका को किसी चीज की कमी महसूस होने नहीं दी। मैंने उसे सुझाव दिया की, उसकी देखरेख के लिये एक बाई रख लेते है, लेकिन उसने मना कर दिया। वह व्हीलचेयर पर बैठकर और बैसाखी के सहारे चलफिर सकती थी। लेकिन उसे घूमना भी तो किधर था..? वह अपने कमरे में बैठकर शुन्य में ताकती या फिर कविता सोचती, पढ़ती या गाती थी। कविता में उसकी रुचि बचपन से ही थी। उसकी कविताएँ पढ़ने की मैंने कभी जहमत नहीं उठाई। वैसे एक-दो कविताएँ मैंने पढ़ी थी। उसमें उसके कितने अद्भुत विचार रहते थे..! लिखती है, कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं एक पंख की तरह हल्का हो जाऊं और दूर उड़ जाऊं। क्या यह कल्पना करना अजीब नहीं है कि एक अपंग व्यक्ति पंख लगा कर उड़ रहा है? और दूर उड़कर जायेगी भी तो किधर? इसे तो बगल के रुममें भी जाने में बोरियत लगती है। पर मैं उसे कभी कुछ नहीं बोलती थी। ऐसे लोग खुद को अकेला समझकर और फिर कुछ उटपटांग सोचकर कविताएँ करते रहते है, इतना सोचकर में चुप बैठती थी। इसके अलावा, अगर मैं कोई आलोचना करती, तो वह विनम्रता से मुस्कुराती। उसकी मुस्कान यह इंगित करने के लिए थी कि सामने का व्यक्ति मूर्ख था, और उसे सारी बुद्धि दी गई थी!
मेरा और उसका बचपन बहुत करीब नहीं था। कारण था उसका स्वभाव, अजीब सी पसंद और सनकी शौक। मैं बचपन में बड़ी मुश्किल से तितलियों को इकट्ठा करके, उनके पंखों में रस्सियाँ बाँधती थी और ये पागलों की तरह उन रस्सियों को काटकर उनको छुड़ा देती थी। रंगरूप तो है नहीं, रहनसहन भी एकदम गंदा, और ऊपर से उसकी विनम्र हँसी! कभी-कभी मुझे उस पर गुस्सा आ जाता था। घर में धन की कोई कमी नहीं थी। लेकिन ये खर्चा नाम मात्र का करती थी। यहाँ तक कि कपड़े भी बहुत साधारण ही पहनती थी। मेरा मतलब है, अगर कोई मेरे पास आया, तो उनके सामने मुझे निचा दिखाना, उसका यही इरादा था। पापा कहते थे कि अवंतिका का दिल बड़ा है। लेकिन मैं कसम खाके कहती हूँ कि उसे मुझसे जलन थी।
उसके बोलने के अंदाज से ही पता चलता है। मुझे पैसा मिलता है, मेरा नाम हर जगह है, यही बात उसको हजम नहीं होती थी। ऊपर से अपशकुनी कहती क्या है, "दीदी, आप सिनेमा का धंदा छोड़ दो, वहां के लोग अच्छे नहीं हैं।"
तो मैंने कहा, "मैडम, लोग अच्छे हो या बुरे..! आजकल पैसा जरुरी है।"
तब आँखों में पानी लाकर यहां तक की नाटक करते हुये कहती है, "दीदी, पैसा पैसा क्या करती हो..? हम लोगों को पूरी जिंदगी कुछ काम करना ना पड़े, इतना आपने कमाया है। ज्यादा पैसोँ के पीछे भागकर आप इस गंदगी में बहोत अंदर तक धसती जा रही हो।"
गंदगी..! घर बैठकर, मेरे दमपर उछलनेवाली, आज मुझे ज्ञान देने में इसका क्या जाता है..?
मैं यह सब कैसे तो सह रही थी; लेकिन दीपक के मामले में तो कमाल ही हो गया। दीपक हमारे 'शायर' हैं। फिल्मी गाने लिखते है। दिखने में सुंदर, व्यवहार में सीधासाधा सा। कहता है, 'सिनेमा का गाना मतलब सब बाजारू माल है।' उसके ऊपर पुरे घर की जिम्मेदारी थी। इसलिए उसने अपने मन के विपरीत ये काम स्वीकार किया था। मैंने खुद इस बारे में पूछताछ की। उस पर विश्वास दिखाया। धीरे-धीरे हम अच्छे दोस्त बन गए। मुझे दीपक से प्यार हो गया।
सच तो यह है कि मेरी उम्र इतनी भी नहीं थी कि मुझे कोई भी आदमी से प्यार हो जाए, और हमारे व्यवसाय में सुंदर पुरुषों की कोई कमी नहीं थी। लेकिन दीपक अलग थे। इस धंदे में रहकर भी वो कमल के पत्ते की तरह सूखे ही रहे। उसका मानना था कि अगर हम बेहतर होंगे तो हमारा काम बेहतर होगा। बहुत गंभीर, आत्म-जागरूक, धीरे-धीरे मैं भूरी आँखों वाले उस युवक को पसंद करने लगी। एक दिन मैं उसे घर ले आयी; और क्या पता कैसे, वह अवंतिका से परिचित हो गया। उसकी विकलांगता को देखकर उसे बहुत दुख हुआ। यह बात मुझे अच्छी लगी। क्योंकि इससे उसे मेरी सुंदरता में और दिलचस्पी होगी।
जैसे ही वह घर से निकल रहा था, मैंने कहा, 'क्या आपको नहीं लगता कि हम दोनों बहनें बहुत अलग हैं?'
'हाँ सो तो है...!" इतना ही कहा उसने और आँखें मूंदे बैठा रहा।
मुझे अवंतिका का उसके साथ दोस्ती करने का प्रस्ताव पसंद नहीं आया। लेकिन जब भी वह आता, तो वो ही उसके साथ बैठकर बातें करती थी। जैसे वह कोई इसका ही मेहमान हो! खैर, दोनों के बीच बातचीत इतनी रंगीन हो जाया करती थी कि मुझे ही बिच में कूदकर दीपक से दस बार बाहर जाने को कहने के बाद वो तैयार हो जाता था। बिच-बिच में समय मिलनेपर वह उसके लिए अंग्रेजी-हिंदी कविता की पुस्तकें लाता था। मैंने आज तक कभी दीपक को मुस्कुराते हुए नहीं देखा। लेकिन अब वो अवंतिका से बातें करते-करते जोर-जोर से हंसने लगा था। अवंतिका भी खुश थी। कभी-कभी वह कर्कश स्वर में उसे अपनी कविता सुनाती, और वह भी, अपनी आँखें मूँदकर सुनता और जैसे कि उसने उसे मतलब उस कविता को अपने दिल में समा लिया हो। मुझे उसकी मूर्खता पर हंसी आती थी। लेकिन बाद में बात हाथ से निकलने लगी।
एक दिन दीपक ने मुझसे कहा, 'अरुंधति, आपकी बहन के अंदर कविता रचने का गुण मतलब एक आच्छादित माणिक्य है!'
मैं हँसी और कहा, 'अरे नहीं! सही में कोयले का माणिक्य है!'
क्या इतनी बड़ी कवयित्री बन गईं माधुरी? लेकिन दीपक जैसा बुद्धिमान आदमी उसके ऊपर फ़िदा हो जायेगा, अब क्या कहु मैं..! बेशक मुझे पता था कि क्या कहना है। लेकिन वह शुद्ध पागलपन था। मेरे जैसी सुंदरता की मूर्ति सामने होते हुए भी दीपक का उस मरियल लड़की के प्यार में पड़ने का क्या मतलब है? कभी-कभी पुरुष कितनी मूर्खता करते हैं! यह कहना झूठ नहीं है कि प्यार अंधा होता है; और अवंतिका जैसी लड़की से प्यार करने के लिए वाकई अँधा आदमी ही चाहिए!
लेकिन मैं आसानी से हार माननेवाली नहीं थी। हालांकि दीपक को समझ या फिर परख नहीं है, लेकिन मैं उसको अपने हाथ से जाने नहीं देनेवाली। मैंने एक बार समय देखकर अवंतिका को अच्छी समझ दी, खूब डाँटा। दीपक ने उस दिन अवंतिका को उपहार के रूप में एक कांच का फूलदान दिया था। अंदर, दो प्रेमी हाथों में हाथ डाले खड़े थे। अवंतिका ने जैसे ही मुझे वह फूलदान दिखाया, मुझे गुस्सा आ गया। कहा, 'मैं सब भेष समझ रही हूँ! तुम्हें उससे प्यार हो गया है। लेकिन याद रखना, आज भले ही उसे तुम पर क्रश है, जब उसे ध्यान आएगा की उसने एक लंगड़ी लड़की से प्यार किया है तो वह रोता रहेगा।' मुझे लगा मेरी ये बातें उसके दिल पर लगेगी, लेकिन नहीं अवंतिका ऐसी थी की उसकी आँखों से आंसू तक नहीं टपके। सिर्फ अपने होंठ भींचकर चुप खड़ी रही।
उसने वो कांच का फूलदान अपने डेस्क पर रखा और बहुत देर बाद कहा, 'आप सही कह रही हो दीदी. उनको समय पर रोकना चाहिए।'
मुझे लगा कि अब वह रोएगी। उसकी आँखों में आंसू थे। लेकिन फिर उसने कविताओं की पुस्तक उठाई और उसमें सिर घुसाकर बैठ गई! क्या पाखंडी लड़की है!
फिर भी मेरा गुस्सा कम नहीं हुआ। मैंने तय किया कि मुझे वास्तव में अवंतिका को अच्छी समझ देनी जरुरी है। मेरे बिच में आने का अंजाम बुरा होगा और इसकी शर्म उसको होनी चाहिए ऐसा मैंने तय किया। मैंने अपनी कार निकाली और तुरंत बाजार की ओर चला दी।
जब मैं बाजार पहुँची तो देर रात हो चुकी थी। सारी दुकानें बंद हो रहीं थी। बाजार में अंधेरा हो रहा था। मैं डर गयी थी। मेरे जैसे कलाकार ने अकेले रहना खतरनाक था। चालाक दुकानदारों की नजरों को देखकर मैं परेशान थी।
तभी मुझे एक दुकान दिखाई दी। इसके बोर्ड लगभग बंद होने जा रहे थे। लेकिन जैसे ही मैं पास गयी, वे अपने आप खुल गए। मुझे लगा कि यह थोड़ा अजीब है। लेकिन तब मुझे एहसास हुआ कि मालिक ने दरवाजा खोल दिया था जब उसने मुझे दुकान बंद करते देखा। झुर्रीदार शरीर और कुबड़ा के साथ मालिक बहुत बूढ़ा था। हालाँकि, उसकी आँखें हरी और चमकीली थीं। उसने मुझे इशारा किया और कहा, 'चलो! मेरे पास वह आईना है जो तुम चाहती हो।'
मैं अंदर गयी। पूरी दुकान आईने की शीशों से जगमगा रही थी। छतपर काँच के झूमर टंगे हुए थे। उसके चेहरे पर आईने के रोशनी की किरणें चमक उठीं। उनके हजारों सूक्ष्म प्रतिबिंब आइनों में दिख रहे थे। उसे तो ऐसा लगा कि वह किसी बड़े हीरे के अंदर बंद है।
मैं उलझन में थी। मैं एक बड़ा आईना खरीदना चाहती थी; लेकिन मुझे नहीं पता था कि कौन सा आईना बेहतर था और कौन सा बुरा। सामने के आईनों के आईनों में और उनके अंदर असंख्य आईनों में इतने प्रतिबिंब थे कि किसी भी आईना के मूल आकार की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। अंत में, दुकानदार ने मुझे एक बहुत बड़ा आईना दिखाया जो उसने एक ऊँचे स्थान पर रखा था। इतना बड़ा आईना मैंने कभी नहीं देखा। ऊंचाई की वजह से या पता नहीं किस वजह से, लेकिन उसमें कोई प्रतिबिंब दिखाई नहीं दे रहा था। आईने में एक गहरी, रहस्यमयी हरीभरी छाया थी। मेरी आत्मा ने इतना बड़ा आईना लेने की हिम्मत नहीं की; लेकिन जब मैंने उसे देखा, तो मैं उसमें इतना अभिभूत हो गयी की मुझे लगा जैसे मैं कहीं बीच मझदार में फंस गयी हूँ। जैसे मैं किसी सपने में हूँ और पैसे गिनकर मैंने वो आईना ख़रीदा और वापस घर आगयी।
अवंतिका अपने कमरे में सो रही थी। मैंने नौकरों की मदद से अवंतिका के रूम में सामनेवाली दीवार पर आईना लगा दिया। अवंतिका होनेवाली आवाज से उठ बैठी। नौकरों के जाते ही उसने मुझसे सवाल किया, 'दीदी, ये आईना इधर क्यों लगाया???'
अपनी आवाज में यथासंभव कठोरता के साथ, मैंने उत्तर दिया, 'आपके रूप को बारबार देखने के लिए, और हमेशा ध्यान में रखने के लिए।"
मुझे कोई शक नहीं था कि इस मौके पर अवंतिका को चोट लग जाएगी। मेरा खुला सुझाव था कि वह अपना दुख बांट कर दीपक को भूल जाएं। एक या दो दिन के लिए, वह थोड़ी असहज महसूस कर रही थी; लेकिन चार-छह दिन और बीत गए और देखते ही देखते अवंतिका बेहद उत्साहित नजर आने लगीं। वह अपना कमरा साफसुथरा रखने लगी। अच्छे-अच्छे कपड़े भी इस्तेमाल होने लगे। दीपक भी हमारे पास बार-बार आने लगा। एक-दो बार उसने अवंतिका को कार से बाहर भी घुमाकर लाया! अवंतिका अब व्हीलचेयर का इस्तेमाल नहीं कर रही थीं। वह बस बैसाखी की मदद से पुरे घर में घूमफिरने लगी थी। मैं कभी भी बाहर से आती हूँ तो उन दोनों का अंदर से हँसने खेलने की आवाजें या फिर बैसाखी के खटपट की आवाजें ही सुनाई देती थी..!
मैं उसके इस अचानक परिवर्तन पर चकित थी; लेकिन इसके बारे में पूछे बिना, मैंने उससे कहा, 'क्या बात है अवंतिका..! तुझे तो इस आईने का बहुत फायदा हुआ सा लगता है..? आईने के आने के बाद से ही तू एकदम साफ़सुथरी रहने लगी है..!'
अवंतिका धीरे से मुस्कुराई। उसने कहा, 'दीदी, तुम्हें पता नहीं है कि तुमने मुझ पर कितना बड़ा एहसान किया है।"
मैं चुप ही रही। मुझे नहीं पता कि अवंतिका किस बारें में बात कर रही हैं।
'दीदी, मैं इन दिनों बहुत खुश रहने लगी हूँ। बहुत खुश। तुम्हारे लाए इस आईने की वजह से सब कुछ हुआ। मेरा रंग, मेरा लंगड़ापन - मैं सब कुछ भूल सा गयी हूँ।'
'इस आईने की वजह से क्या तुम अपना लंगड़ापन भूल गयी?' मतलब कुछ समझी नहीं मैं।
'आप इस पर विश्वास नहीं करोगी दीदी। मैं पागल हूँ, मैं भ्रमित हूँ, ऐसा आपको लगता है। मैं जानती हूँ।' अवंतिका मेरे बहुत करीब आ गई और पत्तों की सरसराहट जैसी नरम, बहुत कोमल आवाज में कहने लगी, 'लेकिन यह रहस्य इतना सुंदर है कि यह बात किसी को भी बताया नहीं तो मुझेसे बर्दाश्त नहीं होगा। मैंने अभी तक दीपक को बताया तक नहीं है। लेकिन, दीदी ये आपका अधिकार है। तुमने ही मुझे यह खुशी दी है। तो यह आपसे कैसे छुपाया जा सकता है? आईना लाने के बाद यह एक या दो दिन की बात है। मैं शुन्य में बैठकर बस उस आईने में अपना प्रतिबिंब देख रही थी, और देखते ही देखते मेरा प्रतिबिंब और मैं एक हो गए। आईने में, जो हमारे जैसा कमरा दिख रहा था, मैं उसमें टहलने लगी। लेकिन आईने का वो कमरा इस कमरे जितना शुष्क नहीं है। वह रंग में उतना ही हरा है; जैसे की नंदनवन हो। हरा कमरा, कल्पना के स्वर्ग की तरह। उस कमरे की कोई छत नहीं है, और उसका कोई अंत नहीं है... वह क्षितिज तक फैला हुआ है। उधर की जमीन भी एकदम हरीभरी मुलायम, मख़मली है। मुझे ये कैसे पता चला बताऊ..? यार, मैंने वहाँपर अपने पैर रखकर देखा है..! - हाँ, मैं वहाँ खड़ी रह सकती हूँ। मैं बिना गिरे चल सकती हूँ। इतना ही क्या, नाच सकती हूँ, खेल सकती हूँ। और तो और दीदी, उस कमरे में भी एक आईना है, ठीक इस कमरे में लगे आईने की तरह। लेकिन आपको पता है दीदी उस आईने में मैं इतनी सुंदर दिखती हूँ ना की क्या बताऊ..! मेरी कल्पना में, मेरी कविता में जो कुछ है जो मैं वास्तव में चाहती हूँ वो सब कुछ उधर है दीदी। मैं असली हूँ तो, वह वहां हूँ; और उधर मैं बहुत सुंदर हूँ... बहुत बहुत सुंदर..!'
मैंने उसके मुंह पर एक तमाचा मारा और उसका बड़बड़ाना बंद कर दिया। नहीं तो वह कब तक इसी भ्रम में बातें करती रहती पता नहीं..? मैंने गाड़ी निकाली और तुरंत दीपक के पास गयी। अवंतिका को भ्रम हुआ है यह उसे बताना ही पड़ेगा।
दीपकने मुस्कुराते हुए मेरा अभिवादन किया। उसने मुझसे कहा, 'अरुंधति, अच्छा किया आप आगयी। मैं आपको अवंतिका के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ।'
इसका मतलब इसको भी यह बात पता चल चुकी है..? मैं अचंभित हुई। लेकिन दीपक के अगले वाक्य ने मुझपर वज्र वार किया।
"मैंने अवंतिका से शादी करने का फैसला किया है, अरुंधति।"
"शादी..! उस अपंग से शादी?"
दीपक की आवाज बहुत कड़क हो गई। 'वह अब अपंग नहीं रहेगी, अरुंधति। पिछले एक पखवाड़े में वह अपने कदम जमीन पर रखने में सफ़ल हुयी है।'
मुझे एक और झटका लगा। 'अवंतिका..? और चलने लगी..! यह संभव नहीं है! यह असंभव है!' मैं चिल्लायी।
'यह संभव हुआ है, मैं यह भी नहीं जानता कि कैसे। मेरे पास कोई स्पष्टीकरण नहीं है। शायद केवल इच्छा शक्ति के बल पर हो सके तो..! क्योंकि एक दिन उसने कहा, 'मुझे सच में चलने का मन कर रहा है।' और उसने कोशिश की। वह कदम रखने में सक्षम होगयी! परन्तु... परन्तु... अरुंधति, क्या आप इस खबर से खुश नहीं हैं?'
'मुझे नहीं लगता कि इसमें से कुछ भी सच है। वह बहक गई है। उसे भ्रम हुआ है।' इतना कहकर मैंने अवंतिका हो रहा भ्रम दीपक को बताया।
यह जानकर सच तो यह है कि दीपक को उससे नफरत करनी चाहिए थी। लेकिन वह इसके बजाय मुझ पर कूद पड़ा, 'वह पागल नहीं है अरुंधति, तुम पागल हो! पागल तो तुम हो जो सोचती हो कि आईने की दुनिया झूठी है! उसमें गलत क्या है? क्या अवंतिका का मन सुन्दर नहीं है? जो ऊपरी शरीर तुमको दिख रहा है, दुबला, बदसूरत। तुम्हारा मन कितना गंदा है! आपको अपनी सुंदरता पर गर्व हुआ है। आपने अवंतिका को अपने रूप की याद दिलाने के लिए उसके सामने एक आईना लगा दिया! अवंतिका उससे परे देख सकती थी। तुम उसके प्रति कितनी क्रूर थी! आप हमारे प्यार को बर्दाश्त नहीं कर सकी!'
'दीपक!' मैं फूट-फूट कर रोने लगी। आज तक किसी ने मुझसे इस तरह बात नहीं की। 'दीपक, मैं आपसे मतलब... आई लव यू। इसलिए मैंने ऐसा बर्ताव किया... दीपक...'
'बस..! सिन मत करो। क्या आप जानते हैं प्यार का मतलब?' दीपक चिल्लाया।
लेकिन फिर मैं जलभुन गयी। वहाँ से तुरंत निकल गयी। सीधा आकर मैं अवंतिका के कमरे में घुस गयी। मैं उसे चेतावनी देनेवाली थी कि दीपक आज से मेरे घर में पैर भी नहीं रखेगा।
लेकिन अवंतिका अपने कमरे में नहीं थी। हालाँकि, मेरे सामने का वो आईना उस खाली कमरे का मेरा प्रतिबिंब दिखा रहा था। मैं उस प्रतिबिंब को देखती रही। दीपक के शब्द मेरे कानों में बजसे रहे थे, 'आपको अपनी सुंदरता पर गर्व हुआ है। आपने अवंतिका को अपने रूप की याद दिलाने के लिए उसके सामने एक आईना लगा दिया! अवंतिका उससे परे देख सकती थी। तुम उसके प्रति कितनी क्रूर थी! आप हमारे प्यार को बर्दाश्त नहीं कर सकी!' और देखते ही देखते ऐसा लग रहा था जैसे कमरा पिघल रहा हो। मंत्रमुग्ध होकर मैं आईने के पास गयी। नजदीक... एकदम नजदीक। मुझे ऐसा लगने लगा मैं और मेरा प्रतिबिंब एक ही हो। अचानक मुझे एहसास हुआ कि मैंने आईने की विशाल खिड़की के अंदर कदम रखा है। आईने में जो कमरा था वह अवंतिका के कमरे जैसा ही था। लेकिन इसकी लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई मापी नहीं जा सकती थी। और फिर मुझे ऐसा लगा कि मैं उसमें फंस गयी हूँ। यह एक भव्य जेल की कोठरी में कैद होने जैसा था। इस कमरे का रंग हरा था, बिल्कुल बाहर के कमरे की तरह; लेकिन ये हरियाली इतनी शांत नहीं थी। कमरा गहरे हरे रंग का था, जैसे काई से भरा कुआँ।
देखते ही देखते, मुझे अजीब सा अकेलापन महसूस होने लगा। इस डर से कि मैं इस विशाल कमरे में अकेली हूँ, मैं एक जगह से दूसरी जगह सिर्फ़ भाग रही थी। लेकिन हर तरफ दीवारें थीं। मेरी आत्मा काँपने लगी और डर से मेरा दम घुटने लगा था। अब मुझे उस हरे-भरे अँधेरे से डर लग रहा था। कोई कहीं से आएगा और मुझे पकड़ लेगा, ऐसा अहसास हो रहा था। मैं डर के मारे चिल्लाने लगी। लेकिन मैं कितना भी चिल्लाऊं, मेरे मुंह से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था।
मैं अपनी जान बचाने के लिए वहाँ से दौड़ पड़ी और अचानक मेरे सामने एक औरत आकर खड़ी हो गयी। बिखरे हुए बाल, क्रूर, जानलेवा हँसी! विद्रूप! देखती हूँ तो क्या वो तो... वो तो टंगा हुआ आईना ही था। उसे देखते ही शरीर में सिहरन दौड़ गयी। अपनी मैं जान बचाने के लिए चिल्लाते हुए मैं भागी और किसी तरह अवंतिका के कमरे में पहुँची।
लेकिन शरीर की सिहरन अभीतक गयी नहीं थी। उस भयानक आईने को फ़िरसे देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। नहीं, जब तक वह आईना उस कमरे में है तबतक, मेरा डर कम नहीं होगा। मैंने कमरे के चारों ओर देखा और अचानक मुझे अवंतिका की मेज पर वह काँच का फूलदान दिखाई दिया। मैंने उसे उठाया।
- तभी अवंतिका दरवाजे पर आ गई। उसके हाथ में बैसाखी नहीं थी। एक-एक कदम बढ़ाते हुए वो मेरी तरफ बढ़ने लगी। उसके पीछे दीपक था। उसका चेहरा खुशी से भरा था।
मैंने अपने दाँत भींचकर और अपनी सारी शक्ति इकट्ठी की और उस विशाल दर्पण के ऊपर फूलदान को दे मारा। जोर का शोर हुआ और शीशा चकनाचूर हो गया।
- और उसी वक्त अवंतिका जमीन पर गिर पड़ीं! दीपक को उसे पकड़ने का भी मौका नहीं मिला। मैंने आगे झुककर उसे पकड़ कर व्हील चेयर पर बिठा दिया।
दीपक की ओर मुड़कर मैंने उसे साफ-साफ शब्दों में कहा- ''मिस्टर दीपक, अब से मेरे घर का दरवाजा तुम्हारे लिए बंद हो चुका है।"
बेचारी अवंतिका! पिछले कुछ दिनों में शुरू हुई उसकी हंसी अब खत्म हो चुकी थी। अब वह हमेशा की तरह उदास और मुरझाई हुई लग रही है। उसके मन में चलने का जो क्रेज था, वह अब तक दूर नहीं हुआ था। ज्यादातर समय वह व्हीलचेयर में बैठती रहती है। मैं यह सब बिना कुछ चिल्लाये, बड़बड़ाए करती हूँ। क्या करें हालांकि लंगड़ी ही सही, आख़िरकार वह मेरी मुँहबोली बहन जो है!
समाप्त
#लेखनी
#लेखनी दैनिक प्रतियोगिता
©पी.के.
Swati chourasia
11-Nov-2021 04:03 PM
Very nice 👌
Reply
pk123
11-Nov-2021 04:41 PM
Thanks
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Niraj Pandey
11-Nov-2021 10:15 AM
बहुत ही बेहतरीन कहानी👌
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pk123
11-Nov-2021 10:38 AM
Thanks
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Lekhika Ranchi
11-Nov-2021 12:57 AM
बहुत बेहतरीन कहानी
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pk123
11-Nov-2021 09:33 AM
धन्यवाद
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